जीवन की सच्चाई यह है कि इन्द्रियां बहिर्मुखी हैं, जिससे बाहरी चीजों के लिए आकर्षण होता है !!!


बैंगलुरू आश्रम

सत्संग माने जीवन की सच्चाई क्या है, इस पर ध्यान दें। सच्चाई यह है कि हमारी  पांचो इन्द्रियां बहिरमुख हैं। बाहर का आकर्षण ज्यादा है, भीतर का कम है। यह जीवन की सब से पहली सच्चाई है। आप आकर्षण से क्यों विमुख होना चाहते हैं, क्यूंकि आप जितना आकर्षण मे जाते हैं, कुछ मिलता तो नहीं है मगर छोड़ने में दिक्कत आती है। सुख़ की चाह से आप  चलते हैं तो दुःख मिलता है। यह  अनुभव मे आया है।  आकर्षण का मतलब कुछ देखने की चाह है, कुछ सुनने की चाह है, कुछ सूँघने, कुछ स्वाद लेने की चाह है। यह  चाह बाहर की है, क्योंकि सारी इन्द्रियां  बहिरमुख हैं। अच्छी  चाह के पूरे होने पर तृप्ति मिलती है क्या? तात्कालिक तृप्ति मिलती है कुछ समय के लिए पर फिर बैचैनी ज्यादा मिलती है। यह  दूसरा  सत्य है कि तात्कालिक तृप्ति मिली और साथ में बेचैनी मोल लेकर आ गये। यह  बेचैनी ईकठ्ठा होती गई फ़िर बाहर की किसी भी चीज मे रूची खत्म होने लगी। यह मान लीजिये कि आप बेचैन हैं, बहुत बढ़िया ख़ाना सामने रख़ा है परन्तु मन नही होता वो खाना ख़ाने का। घर मे इतनी सुविधा है, इतने सारी सीडी हैं, परन्तु सुनने का कोई शौक नहीं | शादी शुदा हैं, घर में साथी संगनी है परन्तु संभोग मे रुची नहीं है। अच्छे अच्छे कपडे रखे हैं परन्तु पहनने में  रुची नहीं है | अरुचि पैदा होती है बेचैनी से|  यह  चक्र है, कि आप आकर्षण के साथ गए, क्षणिक सुख मिला, साथ मे बेचैनी मिली,  सुख तो चला गया बेचैनी रह गयी | यह बेचैनी बढ़ने से अरुचि पैदा हो जाती है। फ़िर जैसे आप कुछ देखने गए, मैसूर घुमने गये, रेस्टोरेंट मे खाना खाया, अरे क्या म्युज़ीयम देखना है चलो छोडो,  इतने दूर से आये मैसुर में म्युज़ीयम पॅलेस देखने, कुछ देखा ही नहीं । कुछ लोग यहां से वैष्णौ देवी गये, पहाड ईधर उधर देखा, नीचे कटरा में खा पी के आ गये, अरे छोडो क्या देखना, कोई रुचि ही नही है। क्योंकि  बेचैनी मन में है तो वह किसी चीज का सुख लेने नही देती। यह मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी समस्या है। अरुचि पैदा होती है इससे लेकिन आकर्षन छूटता नहीं है, अरुचि पैदा हो और आकर्षण छूट जाये तो बड़ी बात है। अब इस परिस्थिती में क्या करना चाहिए ? अंतरमुख होना चहिये । कैसे अंतरमुख होए। यहाँ आकर सारी  बात अटक जाती है। ना अंतरमुख हो पाते है ना बहिरमुख मे रुचि पैदा होती है। ना बाहर की दुनिया मे मन लगता है ना ध्यान में। रुचि लगती है परन्तु क्षणिक होती है। इस हालत मे क्या करें| इस आकर्षण को कैसे बदलें| यह  सबसे बड़ा प्रश्न है। इसका उत्तर कहीं से टपकेगा नहीं। उत्तर तो उपजाना पड़ता है। जैसे बीज बोते हैं और उसमे से पेड़ निकलता है वैसे बीज उपजे, यही सत्संग है। जीवन की सच्चाई क्या है, ये जानना काफी है कि जीवन की सच्चाई यह है कि इन्द्रियां बहिर्मुखी हैं, जिससे बाहरी चीजों के लिए आकर्षण होता है, आकर्षण में जाके देख़ लिया है कि तृप्ति नहीं मिलती | क्षणिक सुख मिला साथ में बेचैनी भी मिली, बेचैनी इकठ्ठा होने लगी जिससे अरुचि पैदा होने लगी| जब हम सत्य को पहचानते हैं और स्वीकार करते हैं तो आधा काम हो गया ।

जीवन मे सत्य क्या है, आप यह देख़ने के लिये तैयार ही नहीं हैं । मेरे जीवन की सच्चाई क्या है, यह  जानना ही सत्संग है । फिर अब इस आकर्षण से कैसे छूटें । इस आकर्षण से छूटने के लिये उससे बड़ा आकर्षण चाहिये। जब ध्यान में, ज्ञान में, भजन में,  सेवा में ऐसा कुछ रस मिल जाता है तो अन्य आकर्षण फीके पड़ने लगते हैं। एक गणित के प्रोफेसर को इतना गणित मे रस था और उसमें  खो जाते थे, कि चलते चलते अपने घर से भी आगे निकल जाते थे। जब भी संसार में किसी के द्वारा कोई बड़ा अविष्कार हुआ है, उन लोगों को और किसी चीज मे रस नही था। बाकी चीजों के आकर्षण से वो ऊपर उठ गये थे।

और तीसरा है की ज्ञान के द्वारा एक लगाम लगाना। जैसे गाडी मे ब्रेक होते हैं , उसी तरह वैराग्य में भी ब्रेक होता है,जब भी आप आकर्षण विमुक्त होने लगते है। अब इन सबके बावजूद भी यदि  इन्द्रियां विषयों के पीछे भागती हैं, जैसे की नींद आना, भूख लगना, तो अपने आप को कोसिये मत, समझे कि ये इन्द्रियों का स्वभाव है और इससे  निवृत्त हो जाये, विश्राम  करे। आकर्षण को हासिल करना श्रम साध्य है, लेकिन उसका सुख क्षणिक है। असली सुख मिलता है विश्राम से | विश्राम  का सुख श्रम के सुख से कई  गुना अधिक है|  पांचो इन्द्रियों में से किसी भी इंद्री का सुख भोगने में शक्ति क्षीण होती है। थकान होती है। परिश्रम लगता है, परिश्रम से प्राप्त सुख निम्न सुख है। विश्राम का सुख उँचा सुख है। विश्राम के सुख से ऊर्जा बढती है|  चेतना जगती है, बेचैनी दूर होती है। तो जब भी आप बेचैनी को इकठ्ठा करते हैं तो उसको विश्राम के द्वारा दूर कर सकते है। गहरे विश्राम को भी ध्यान कहते है,  ध्यान करते करते हम इससे पार हो सकते हैं| यहीं महत्त्वपूर्ण बात है। एक  रास्ता है जिसमे सुख मिले और बेचैनी न हो। और ऐसा सुख मिले कि दुःख  न हो। यहीं अंदरूनी चाह है, ऐसे सुख की तलाश जिसमे दुःख न हो, इसी की तलाश को जिज्ञासा कहते हैं और ऐसे जिज्ञासु को साधक कहते हैं । यह  सुनने कहने मे आसान है लेकिन करने मे मुश्किल है मै जनता हूँ परन्तु असंभव नही है। ऐसे साधक जिनके मन मे ये ईच्छा जागी, उनके लिये मुश्किल नहीं  है। तभी प्रार्थना जागती है । जब बहुत प्यास लगी हो तो जिस तड़प से आप पानी मांगते हो, उस तड़प से जब चाह उठती है तो उसको साधक कहते हैं। अब यह मत सोचिये कि मैं साधक हूँ की नहीं, मुझमें वह तड़प है या नहीं, तड़प है यह मान के चले। थोडा सा आकर्षण है यह मान लीजिये और वह  आकर्षण कम हो रहा है यह भी सच्चाई है। पाँच साल पहले जितना आकर्षण था उतना अभी है क्या ? ज्ञान से या समय से आकर्षण कम होता है। जैसे आकर्षण कम हुआ तो मन मे विश्राम मिलता है | विश्राम मिला तो राम मिल गये । कोई देरी नहीं हुई |
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