एक दिन मृत्यु आपसे सब छीन ले जायेगी!!!


२८.१२.२०११,जर्मनी

प्रश्न: प्रिय गुरूजी, ज्ञान के अभाव के कारण मैंने बहुत बार अपने आप को दुःख पहुँचाया है| मैं बहुत सुधरा तो नहीं हूँ, मगर कम से कम यह देख पा रहा हूँ, कि मैंने क्या किया है| मैं खुद को कष्ट देने से कैसे रोकूं?
श्री श्री रविशंकर: जब आप जानते हैं कि आपने अतीत में जो किया वह सही नहीं था, तब आपको यह पता ही है कि आपको क्या करना है| आध्यात्मिक पथ आपको वह सशक्तिकरण देता है| लेकिन अगर आप कहते हैं, ओह! मैं वह काम नहीं कर सकता, तब आप उसे नहीं कर पाएंगे| अगर आप यह विचार डालेंगे कि, हाँ, मैं कर सकता हूँ, तब आप कर पाएंगे|
मैंने लोगों को कहते सुना है कि, मैं धूम्रपान करना नहीं छोड़ सकता| अगर आप ही सिगरेट पीना नहीं छोड़ सकते तो दुनिया को कोई भी इंसान आपसे सिगरेट पीना नहीं छुड़वा सकता| आपको खड़े होना चाहिए और कहना चाहिए, हाँ, मैं सिगरेट पीना छोडूंगा| प्रकृति ने ऐसी इच्छा शक्ति प्रत्येक इंसान के भीतर रखी है, जो सोच सकते हैं और कर सकते हैं| यह सभी में मौजूद है| यह तो ऐसे हुआ कि आपने खुद अपनी ही आँखें बंद कर लीं, और कहने लगें, मैं देख नहीं पा रहा, मैं देख नहीं पा रहा| अरे पहले अपनी आँखें तो खोलिए!
आप कहते हैं, मैं अपनी आँखें खोल नहीं पा रहा| अब अगर आप अपनी आँखें खोल नहीं पा रहें हैं, या खोलते नहीं हैं, तो फिर आप देखेंगे कैसे?
अब अगर आप कहेंगे कि, मुझे भूख लग रही है लेकिन मैं अपना मुहँ नहीं खोलूँगा| प्रकृति ने आपको एक मुँह दिया है, और वह खाली और खोखला है, और प्रकृति ने आपको भोजन भी दिया है| आपको बस इन दोनों चीज़ों को जोड़ना है| भोजन आपके सामने है, और आप कह रहें हैं, मैं अपना मुहँ नहीं खोलूँगा| ये कहने के लिए ही आपको मुहँ खोलना पड़ेगा|
तो इसलिए, यह इच्छा शक्ति सब में होती है| आपको बस कहना है, हाँ, मैं कर सकता हूँ; मैं करूँगा| अगर आपको सिगरेट पीने की गन्दी आदत है, तो कहिये, हाँ, मैं इसे छोडूंगा| मैं यह कर सकता हूँ| सिर्फ एक यह विचार, मैं सिगरेट पीना नहीं छोड़ सकता ही आपको सिगरेट पीते रहने की शक्ति दे रहा है|

प्रश्न: प्रिय गुरूजी, मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है, कि कुछ लोग एडवांस कोर्स के सत्र से बाहर आकर वापस लड़ने लगते हैं और एक दूसरे को दोष देने लगते हैं| ऐसा क्यों होता है? क्यों वह संदेश  आगे नहीं जाता, कभी कभी कोर्स करने के उपरान्त भी?
श्री श्री रविशंकर: अब देखिये, लंबे समय से लड़ने की आदत और लड़ने में आनंद लेना, इसे जाने में थोड़ा वक्त लगता हैं| कुछ चंद फीसदी लोग हैं, जिनका व्यवहार एक रात में बदला नहीं जा सकता, या हफ़्तों, महीनों तक में बदला नहीं जा सकता| उनको थोड़ा समय लगेगा, वह भी तब जब वे खुद भी बदलने की इच्छा रखें|
इसलिए लोगों को परखें मत| ओह, वे आये और एडवांस कोर्स किया, और फिर भी बदले नहीं! ऐसा असंभव है, वे बेशक बदले हैं, वह बात और है कि अभी उनके व्यवहार में यह पूरी तरह से व्यक्त नहीं हो रही  है|
उनसे पूछिए कि वे कैसा महसूस कर रहें हैं; पहले आप लड़ते थे, और अब भी आप लड़ रहें हैं| क्या आपको कुछ गुणात्मक अंतर लग रहा है? आप देखेंगे कि उनका उत्तर सकारात्मक होगा| वे कहेंगे, हाँ, पहले मैं लड़ता था, और उसका गुस्सा, उसकी छाप बहुत समय तक मेरे साथ रहती थी| लेकिन अब, मैं लड़ता हूँ और भूल जाता हूँ| मैं आगे बढ़ जाता हूँ| ऐसा बहुत लोगों ने कहा हैं| इससे आपको भी मौका मिलता है, कि आप लोगों को वे जैसे भी हैं, स्वीकारें, पहले या बाद में|

प्रश्न: प्रिय गुरूजी, इस प्रश्न के दो भाग हैं| पहला भाग है; मन और आत्मा के बीच क्या सम्बन्ध है? क्या मन सिर्फ विचारों का संग्रह है?
श्री श्री रविशंकर: बिल्कुल सही| आपने एकदम सही कहा|

प्रश्न: विचार प्रथमतः उठते ही कहाँ से हैं?
श्री श्री रविशंकर: यह आपके ढूँढने के लिए है| यह एक व्यक्तिगत खोज है| यह तो ऐसे हुआ कि आप मुझसे पूछ रहें हैं, कि भोजन का स्वाद कैसा है| अगर आप किसी से पूछते हैं, यह व्यंजन कितना मीठा है?, तो वह आपको खुद ही चखना पड़ेगा|
तो अगर आप जानना चाहते हैं, कि विचार कहाँ से उठते हैं, तो अच्छा होगा अगर आप यह खुद ही तलाशें| क्या आपके अंदर विचार उठ रहें हैं? तब, आप उसे तलाश सकते हैं| यह तलाश की प्रक्रिया अपने आप में एक तकनीक है जिससे आप अपने अस्तित्व के एक दूसरे स्तर को समझ पाएंगे|

प्रश्न: प्रिय गुरूजी, कभी कभी मैं अपने दोस्तों को बेहद दुखी देखता हूँ| वे आर्ट ऑफ लिविंग, ध्यान और श्वसन प्रक्रियाओं में विश्वास नहीं रखते| क्या मैं उनका दर्द लेकर आपको दे सकता हूँ? क्या ऐसा हो सकता है? मैं जानता हूँ कि आप परेशानियों को हल करने में चैंपियन हैं|
श्री श्री रविशंकर: हाँ| लेकिन आप इस बात की प्रार्थना क्यों नहीं करते कि उन्हें ध्यान करने की सद्बुद्धि आ जाये? आप यह कर सकते हैं| आप उनके दुःख और कष्ट को आशीर्वाद देकर उन्हें राहत पहुंचा सकते हैं, मगर यह स्थायी समाधान नहीं होगा, क्योंकि वे वापस उसमें आ सकते हैं| लेकिन अगर आप यह प्रार्थना करेंगे कि उनके अंदर ज्ञान जागृत हो, तब वह हमेशा रहेगा| क्योंकि वह ज्ञान ही उनके शेष जीवन में उनका ख्याल रखेगा|

प्रश्न: प्यारे गुरूजी, मैं आध्यात्मिक पथ पर बढ़ रहा हूँ, इसके क्या लक्षण हैं? मैंने अपना पहला कोर्स दस साल पहले किया था| मैंने दस एडवांस कोर्स किये हैं, और मैं टीचर भी हूँ| लेकिन मुझे अभी भी क्रोध आता है| कभी कभी अपने व्यवहार को देखकर तो मुझे ऐसा लगता है, कि जो लोग कोई साधना नहीं करते, वे मुझसे लाख गुना बेहतर हैं| कृपया मार्गदर्शन करें|
श्री श्री रविशंकर: आप सब कुछ गलत समझ बैठे हैं| आप सोचते हैं, कि सिर्फ ध्यान ही आपका सारा काम कर देगा? आप सिर्फ ध्यान का मज़ा ले रहें हैं| अगर आप ज्ञान के रस में इतने डूबे हैं, तो आप व्याकुल क्यों होंगे? आप सोचते हैं कि सिर्फ कुछ समय चुप रहने से आपका काम हो जायेगा और आप ज्ञान और बुद्धिमत्ता को भूल जाते हैं| ज्ञान आपके सम्मुख खड़ा है और कह रहा है, लोग और परिस्थितियां जैसे भी हैं, उन्हें स्वीकारें, लेकिन आप वह कर नहीं रहें हैं| मैं कितनी बार कह चुका हूँ, कि क्रोध दोषहीनता से आपकी आसक्ति का चिन्ह है| अगर आप वैरागी है, तो आप इतने चिंतित क्यों होंगे?
सुनिए, आप भले ही दस एडवांस कोर्स कर लें, और भले ही कितनी बातें सुन लें, लेकिन अगर आप उन बातों को अपने अंदर नहीं ले रहें हैं, तो इसमें न तो कोर्स या ध्यान की, और न ही ज्ञान और बुद्धिमत्ता की कोई गलती है| यह तो उस रबड़ के सूट की तरह हो गया, जिसे स्कूबा डाइविंग के समय लोग पहनकर समुद्र में उतरते हैं| आप भले ही पानी में उतरे हैं, लेकिन जब बाहर आते है, तो सूखे होते है| पानी की एक बूँद भी आपके शरीर में नहीं गयी है, क्योंकि आप उस गीले सूट में थे|
इसी तरह, आप दस चाहे बारह एडवांस कोर्स कर लीजिए, लेकिन अगर आपके अंदर वैराग्य नहीं है, जिसके बारे में आप बहुत बार सुन चुके हैं, तब आपको क्रोध आएगा ही|
विवेक, बुद्धि और वैराग्य; ज्ञान का दूसरा स्तंभ| अगर वह नहीं है, तो आप क्रोधित और व्याकुल होने के लिए बाध्य हो ही जायेंगे, आप अधिकारात्मक और ईर्षालु होंगे ही| कोई वैराग्य नहीं है| मैंने कितनी बार कहा है, सो हम, तो क्या! आपने तो क्या! नहीं सुना|
बहुत बार आप उसे यूँही मान लेते हैं| ओह! तो क्या हुआ, ये तो मैंने सुना है, ठीक है| अभी तो आप बस बैठते हैं और ध्यान करते हैं, और बाद में जाते हैं, और कभी याद नहीं रखते| याद रखिये, उसे अपने अंदर समा देने दीजिए| ज्ञान को दोष मत दीजिए| यह आपकी अक्षमता है, कि आप उसे जी नहीं पा रहें हैं, उसे ले नहीं पा रहें हैं और अपनी आत्मा में उसे समा नहीं पा रहें हैं|
क्या आप समझ  रहें है, कि मैं क्या कह रहा हूँ? आप यह नहीं कह सकते, मेरे ये सब बंधन हैं, और मैं फिर भी आध्यात्मिक रहूँगा, नहीं! आध्यात्मिकता हमारे दोषहीनता से ग्रस्त मन को बचाने के लिए है| आध्यात्मिकता माने केंद्रित रहना, स्थित रहना| दस एडवांस कोर्स करने के बाद भी आपको गुस्सा आ रहा है| ज़रा सोचिये, अगर आपने एक भी एडवांस कोर्स नहीं किया होता, तब आपकी हालत क्या होती? मेरे प्यारे, वह भी देखिये!
और अगर एडवांस कोर्स आप पर असर नहीं कर रहा है, तो आप वापिस बार बार क्यों आ रहें हैं? फिर आपने किया ही क्यों? आपको एक कर के कहना चाहिए था, कि यह तो असर नहीं करता, बात खत्म! अगर आप बार बार वापस आ रहें हैं, मतलब कहीं न कहीं तो उसका असर हो रहा है| आप उससे फायदा तो उठा रहें हैं|
और ज़रा सोचिये, अगर आपने ये सब कुछ न किया होता, तब कितनी बड़ी आफत होती| आपको इस बारे में बैठकर सोचना चाहिए| मान लो, मैंने कभी बेसिक कोर्स नहीं किया होता, और कभी ध्यान नहीं किया होता, तब मेरी हालत क्या होती?

प्रश्न: भावनाएं क्या होती हैं?
श्री श्री रविशंकर: आपके अंदर हैं भावनाएँ? बस बिल्कुल वही है|

प्रश्न: प्रिय गुरूजी, एक सवाल बार बार मेरे मन में आता है| हम आकाशगंगा में हैं| इसी तरह और भी बहुत से नक्षत्र मंडल हैं| क्या वहां लोग रहते हैं? क्या इनमें से किसी नक्षत्र में जन्म लेना संभव है? क्या आप इस बारे में अपना अनुभव बाँट सकते हैं?
श्री श्री रविशंकर: मैं जानता हूँ कि बहुत सी आकाशगंगा हैं, लेकिन मैं उनके बारे में बहुत कम जानता हूँ|  हमें उनकी झलक मिल सकती है, लेकिन हम उसे साबित नहीं कर सकते| अगर आप मुझसे कहेंगे कि उसे साबित करिये, तो वो मैं नहीं कर सकता| लेकिन, मैं इतना बता सकता हूँ, कि बहुत सी आकाशगंगा हैं, जहाँ जीवन है| बस इतना ही, थोड़ा बहुत ही, मुझे पता है|
जिन चीज़ों के बारे में मुझे पता नहीं हैं, उनके बारे में बात करने की मेरी आदत नहीं है, या फिर जिनके बारे में मुझे अधिक नहीं पता| तो, यह जिसके बारे में बहुत कम पता है की श्रेणी में आता है|

प्रश्न: जीवन में और अधिक आत्मविश्वास कैसे लाया जाये या महसूस किया जाए?
श्री श्री रविशंकर: जीवन में और अधिक आत्मविश्वास कैसे लाया जाये? इसका कोई तरीका नहीं है!! इसे लाने की कोई सम्भावना ही नहीं है, बस| अगर आपके पास नहीं है, तो बस नहीं है| अगर एक खरगोश को सींग चाहिए, तो मैं कहूँगा कि संभव नहीं है| अगर आपको लगता है, कि आपको हिरन के जैसे सींग चाहिए, तो आप क्रिसमस के समय इस तरह की टोपी लगा सकते हैं (एक सजावटी टोपी की तरफ इशारा करते हुए) आप उसे अपने सिर पर चिपका सकते हैं, लेकिन अगर आपके पास नहीं हैं, तो फिर असंभव है|
लेकिन, अगर आप मुझे सुनेंगे, ध्यान से, तो मैं आपको बता रहा हूँ, कि आपको यह मालूम होना चाहिए कि यह आपके पास है| यह आपके पास बेशक है| किसने कहा कि आपके पास नहीं है| सबसे पहले, अपने बारे में अपनी अनभिज्ञता को स्वीकारें| पहले माने कि आप अपने बारे में कुछ भी नहीं जानते| और फिर आपको एहसास होगा कि आपके पास है| 

प्रश्न: हमारी विचार प्रक्रिया कैसे काम करती है। हमारी जरुरते कैसे पूर्ण हो सकती हैं। 
श्री श्री रविशंकर: विचार आते रहते हैं। कुछ विचारों को आप बढावा देते हो कुछ को आप बढावा नही देते। जब आप कुछ विचरों को बढावा देकर उन पर अमल करते हो तो परिणाम सामने आते हैं। अगर आप खाली बैठकर सोचते रहेंगे और कुछ नही करेंगे तो उत्तम से उत्तम विचार भी फलिभूत नही होगा|

प्रश्न: कृपया  करके योग माया और उसके अध्यात्मिकता के उपर होने वाले परिणामों के बारे में विस्तार से बताऐं। और हम योग माया को कैसे पहचान सकते हैं और उसके खेल से कैसे दूर रह सकते हैं।
श्री श्री रविशंकर: योगमाया एक तरह का कभी कभी महसूस होनेवाला अध्यात्मिक अनुभव है। यह  अंतरज्ञान की तरह होता है और बहुत बार यह अंतरज्ञान का अनुभव सही साबित होता हैं। लेकिन जब आप इसपर बहुत जादा भरोसा रखते है, ध्यान दिजिये मैं कह रहा हुँ बहुत ज्यादा, तो सब बिगडता हैं। और अगर आप सचमुच पुर्णतः खाली और ख़ोकले नही है तो आपकी अपनी इच्छाऐ और महत्वाकांक्षाएं आपको दृष्टिगोचर  होंगी, आपको आवाजें सुनाई देंगी।यह सब हो सकता है लेकिन वह वास्तविकता से दूर होगा।   
तो योगमाया यह वह  छोटी शक्ती, या झलकियाँ, या भास, या अंतरज्ञान से मिलने वाली दृष्टि  हैं जो ८० प्रतिशत सही और २० प्रतिशत गलत होती हैं। लेकिन हम ये नही जानते की कौनसा ज्ञान ८० प्रतिशत मे आयेगा और कौनसा २० प्रतिशत मे। तो हम इन अनुभुतियों को जैसे प्रतीत होती है उसी तरह साधारण से लेते हैं।

प्रश्न: यह कितना सच है कि बच्चे जन्म से पहले अपने माता पिता का चुनाव करते हैं। क्या माता पिता अच्छे भविष्य वाले बच्चों के लिये प्रार्थना कर सकते हैं।    
श्री श्री रविशंकरसुनिये, आप मुझसे यह नही पूछ सकते कि आपने किस लिये प्रार्थना करनी चाहिये। प्रार्थना अपने आप होती है। आप अच्‍छे बच्चों के लिये प्रार्थना कर ही रहे हैं। क्या माता पिता ने अच्छे बच्चों के लिये प्रार्थना करनी चाहिये, यह  एक निरर्थक प्रश्न है। इसका कोई मतलब नही है। आप इस चीज की प्रार्थना कर रहे है, इसीलिये आप ये पूछ रहे हैं।

प्रश्न: अपनी परिस्थिती को महत्व न देते हुऐ कोई इन्सान अपना लक्ष कैसे निर्धारित कर सकता है।   
श्री श्री रविशंकर: कुछ पल के लिये एकांत में बैठ कर सोचें। बाकी सारी चीजें दूर रखें। देखें अपने आप को क्या चहिये, अपने आप से पूछें मुझे क्या चाहिये। और उसके बाद जो भी लक्ष सामने आयेगा उसे पकड़ कर रखें। आप का जो भी सपना, लक्ष या मंजिल होगी उस पर परिस्थिती की गहरी छाप पडेगी। आप अपनी एक मंजिल के लिये काम कर रहे है और अचानक कुछ हो जाता है। आपके किसी प्रियजन की तबियत ठीक नही है या किसी का अपघात हो जाता है। तब उस वक्त आप को लचिला होना पडता है। आप यह नही कह सकते कि मेरा लक्ष तो वह है मुझे जाना होगा। आपको सामने जो भी परिस्थिती है उससे निपटना होगा। क्योंकि जीवन गहन है,यह एक सीधी रेखा कि तरह नही है। इस जीवन की गहनता में अपने लक्ष को बनाऐ रखना ये दृढ़ संकल्पता है। जब आपके जीवन मे भक्ती और ज्ञान उपजता है तो आप यह आसानी से कर सकते हैं। ज्ञान और भक्ती यह दो महत्वपूर्ण बाते हैं जो जीवन को सहज बनाती हैं। आप में से कितनों को ऐसा महसूस हो रहा हैं कि इस मार्ग पर आने के बाद चीजें अपने आप सहज घट रही हैं। अब कोई मुश्किल नही है।

प्रश्नप्रिय गुरुजी मैं अपने आप के घर का स्व का/अपने केंद्र कारास्ता कैसे तलाश करूँ ?
श्री श्री रविशंकर: यह कौन पूछ रहा है। सब छोड दीजिये ,आप क्या पकड के बैठे है। जाग जाये, जाग जाए, आप अपने घर में ही है । आपकी आसक्तियाँ आपको महसूस करवा रही हैं कि आप अपने घर से दूर हैं। और ये आसक्तीयाँ क्या हैं, सुख की, प्रतिष्ठा की। और उस सुख से आपको क्या मिलता है। पाँच या दस मिनिट की कुछ संवेदनाऐं, कुछ उत्तेजनाऐं, इसके सिवा और क्या है। कुछ भी नही है। बिल्कुल कुछ भी नही। इन आसक्तियों ने आप के तन को जला दिया हैं। आपके मन और मस्तिष्क को ध्वस्त किया हैं। और आपको क्या चाहिये। यह जान लीजिये जब आप अपने घर लौटना चाहते है तो पल झपकने की देरी नही लगती। इसका मतलब है एक सेकंड से ज्यादा समय नही लगता। जाग जाए और अपनी सोंच को साफ करे, यह जान लीजिये आप वहीं पर है। अपने मन में जो जाले लगे हैं वे आपने खुद बनायें हैं। आप जानते है, मकडी अपना जाल कैसे बनाती है। कौन बनाता है, कोई और नही। अपने आपकी लार से मकडी ने जाल बनाया, उसमे फँस गयी और यह सोचेने लगी कि मैं मर गयी। आप दुनिया, लोगों, परिस्थिती अपने मन को दोष देते हैं। अपने मन को दोष देना भी छोड दे। आप को सिर्फ झटकना और जागना हैं। आपके पास जो भी है उसे मृत्यु एक मिनिट में किसी भी समय छीन सकती हैं। एक मिनिट भी नही लगता। उससे कम समय मे मृत्यु आपका सब कुछ छीन लेगी। मैं कहता हूँ मृत्यु ने छीनने से पहले आप सब कुछ छोड दीजिये। तब आप मुक्त होंगे और आप यह महसूस करेंगे कि मैं अपने घर में हूँ। एक दिन मृत्यु आपसे सब छीन ले जायेगी। आपका घर, परिवारजन, कार, आभूषण, फ्रिज सब चला जायेगा। असलियत में वह सब कुछ यहीं होगा, आप चले जायेंगे। यह कुछ उलटे तरीके से है। जाग जाये और देखे आपका कुछ भी नही है। क्या आप नहीं कह सकते मेरा कुछ नहीं है और अपने घर नहीं आ सकते। मै बताता हूँ यह एक अनोखी मुक्ती है| मैं यह नही कह रहा हूँ कि जा के आप अपना पूरा बैंक का पैसा खाली कर दीजिये। आप उस पैसे को बैंक में ही रहने दिजिये, दिमाग में नही। समझ गये। बस एक शाश्वत सत्य जो आपके जीवन में घटने वाला है कि आप एक दिन मरने वाले है। उसके बस एक ध्यान से आप न लोभी बनेंगे, न क्रोधीत होंगे, न ही स्वामित्व की भावना जागेगी, न ही घृणा की। यह जानने के लिये आपको कोई ग्रंथ नही पढनें पडेंगे। यह कितना सरल सत्य है। मैं एक दिन मरने वाला हूँ| यह जानने के लिये आपको शास्त्रों का सहारा लेने की जरुरत नही है। इस एक चीज पर दृष्टि रखना आपके जीवन में परिवर्तन लाने के लिये काफी है। साहस, विश्वास और अनुभूति ही ज्ञान हैं। पहले अनुभूति फिर साहस और विश्वास इतनी मुक्तता लाता  है। उसी के बाद असली ध्यान होता है। उस वक्त तक आप सिर्फ बैठ कर आँखे बंद करते है फिर खोलते है। हाँ मन में कुछ शांती जरूर होती है लेकिन उसके आगे और कुछ नही। 

प्रश्न: आर्ट ऑफ लिविंग का शिक्षक होने के नाते जब मै ये देखता हूँ कि लोग कोर्स तो करते हैं लेकिन अपनी साधना नही करते तो मैं निराश हो जाता हूँ| इस निराशा से बाहर कैसे निकलें। क्या उनको साधना के लिये जबरदस्ती करनी चाहीये या छोड देना चहिये।
श्री श्री रविशंकर: उन्हें साधना के लिये जबरदस्ती करने की जरूरत नहीं है। लेकिन प्यार से साधना के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये। जब आप जबरदस्ती करेंगे तो उसके विपरित परिणाम होंगे। लेकिन प्रोत्साहित करना अच्छा है। कुछ अच्छा करने के लिये लोगों को हमेशा प्रोत्साहित करना पडता है। आपको उन्हें चलाना पड़ता है, प्रोत्सहित करना पडता है। आप यह जरूर कर सकते है। लेकिन निराश होने का कोई अर्थ नहीं है। आपकी भावनाऐ कि ओह उन्होने अपनी साधना करनी चाहिये। यहीं उनकी मदद करेगा। यह आशीर्वाद या प्रार्थना ही उनकी मदद करेगा। एक चीज आपको जरूर ध्यान में रखनी चाहिये कि बहुत सारे लोग कोर्स करते हैं और उन्हें समाधान प्राप्त होता हैं। वे कोर्स का आनंद उठाते हैं, खुश होते हैं और चले जाते हैं।
यह ऐसे है। किसी को भूख लगी, उसने होटल मे अच्छा खाना खाया। जब उनका पेट भर जाता है तो अगले कुछ घंटो के लिये वे खाने के बारे में नहीं सोचते। ठीक उसी तरह जब कोर्स करने के बाद लोग इतने तृप्त और पूर्ण महसूस करते हैं कि वे कुछ देर के लिये साधना करने के बारे में नहीं सोचते। जब उनको फिरसे खालीपन महसूस होता है तो फिर वापस आते हैं। बस यही है, जब आप अच्छा खाना खाते है तो सात से दस घंटे या हो सकता है दूसरे दिन तक खाने के बारे में सोचे ही नही। ऐसा ही होता हैं। आप उनको एक पूर्ण भोजन जो पोषक, तृप्त करनेंवाला और स्वादिष्ट है वह देते हैं। लोग वह भोजन खाने के बाद कुछ देर के लिये वापस नहीं आते। लेकिन वे जरूर वापस आयेंगे। लेकिन यदि आप बार बार साधना न करने के लिये उनको कसूरवार ठहराते है तो वे आपसे दूर रहेंगे। उनको दोषी की तरह न महसूस कराये। उनको यह बताये कि जो आपने यहाँ सीखा है उसे दोहराना अच्छा है। लेकिन आप ऐसा नहीं करते तो भी ठीक है। कम से कम कभी कभी वापस आया कीजिये। नहीं तो वे यह सोचेंगे मैने यह सब कुछ सीखा लेकिन साधना नहीं की, मेरे शिक्षक को क्या मुंह दिखाऊ। और यदि वे जब वापस आते हैं और अपको मिलने के बाद आप फिर डंडा लेके उनको बोलते हैं देखो तुमने साधना नहीं की। आप याद कीजिये पाठशाला में वह शिक्षक जो स्केल लेकर कहते थे कि तुमने गृहपाठ नहीं किया क्या वे आपको अच्छे लगते थे। मुझे याद है एक दो ऐसे शिक्षक थे। एक शिक्षक तो अपने छात्रों को जरूर पूछेंगे कि उन्होंनें गृहपाठ किया या नहीं और नहीं तो दंडित भी करेंगे। तो बच्चे भी उस शिक्षक से दूर रहते थे क्योंकि शिक्षक हर बार यही पूछते थे कि तुमने गृहपाठ किया या नहीं। शेष शिक्षक इतना नहीं पूछेंगे। आप उस शिक्षक से बचना चाहेंगे जो आपको आपकी गलती के लिये पकड़ेगा। तो किसी में दोषी भावना न जगाये। जब उनको भूख लगेगी वे वापस आयेंगे। मैंने देखा है जो दस साल से ध्यान शिबिर में नही आये या दस साल पहले कोर्स किया है वे वापस आते हैं। जब जरुरत होगी तो वे जरूर वापस आयेंगे। और आपके पास सबसे लजीज खाना है।

प्रश्न: विरोधाभास गुण एक दूसरे के पूरक होते हैं। क्या प्रेम का कुछ पूरक होता है या इसका कोई विपरीत होता है।
श्री श्री रविशंकर: मुझे लगता है आपने मेरे नारद भक्ति सूत्र के भाष्य नहीं सुने। आप उसे जरूर सुनें। एक ऐसा प्रेम है जिसके लिये द्वेष है। प्रेम का एक अलग स्तर है जो विरोधाभास नहीं हैं। वह ईश्वरीय और अध्यात्मिक प्रेम हैं। एक प्रेम वह है जो भावना के स्तर पर होता है। ओह मैं आपसे प्यार करता हूँ, प्यार करता हूँ, और बाद में मैं आपको बर्दाश्त नही कर सकता। आप प्रिये, प्रिये, प्रिये कहते रहते हैं फिर आपको मधुमेह हो जाता है।


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