हमें हमारे पूर्वजों का सम्मान करना चाहिये!!!

०३
२०१२
अगस्त
बैंगलुरु आश्रम, भारत
(कई भक्तों ने गुरूजी को मोर के पंख भेट किये जिस पर उन्होंने कहा)
मुझे यह जानना है यह मोर पर से उखाड़े गये हैं या यह प्राकृतिक रूप से गिर गये और लोगों ने उसे उठाया| यदि उखाड़े गये हैं तो इन्हें फिर बिलकुल नहीं लाना| हमें लोगों को इसे मोर पर से उखाड़ने के लिये बढ़ावा नहीं देना चाहिये| मुझे नहीं मालूम कि इन्हें उखड़ा गया है या यह प्राकृतिक रूप से गिर गये हैं|
(श्रोता) : गुरूजी इन्हें उखाड़ा गया है|
फिर तो आप को इसे बिलकुल नहीं लाना चाहिये| इसे बिलकुल मत ख़रीदे क्योंकि यदि आप इसे खरीदते रहेंगे तो वे लोग और मोरों को मारेंगे| इसे किसी को नहीं खरीदना चाहिये|
हमें सब जगह पर यह सूचना लगा देनी चाहिये कि किसी को मोर पंख नहीं खरीदने चाहिये क्योंकि इसके कारण कुछ लोगों में और लालच पैदा हो जायेगी और वे बल पूर्वक मोर के पंखों को उखाड़ेंगे|
आप लोगों को क्या लगता है? तो यह तय रहा!!!
यह नया प्रचलन बन गया है| आप को इसे खरीदना बंद कर देना चाहिये |
आज हमने यह बहुत ही अच्छा निर्णय लिया है|

प्रश्न : गुरुदेव मुझे आप के साथ नृत्य करना है?
श्री श्री रविशंकर : मेरी आत्मा तो हर समय नृत्य करती रहती है|

प्रश्न : गुरुदेव क्या गुरु किसी के कर्म को बदल सकता है, और यह कब होता है?
श्री श्री रविशंकर : यदि गुरु अकेले ही व्यक्ति के कर्म को बदल सकते तो वे सभी लोगों के कर्म एक बार में ही बदल देते|
नहीं  आप को कुछ प्रयत्न तो करने ही होंगे|
गुरु निश्चित ही आपको पापों से मुक्त कर सकता है| जब आपने कोई पाप करा और आपको उस पाप  का एहसास हुआ लेकिन आप अपने आप को उस पाप से मुक्त नहीं कर सकते लेकिन गुरु निश्चित ही आपको पापों से मुक्त कर सकता है| तो उस रूप में हाँ !
उसी समय आपको कुछ पुरुषार्थ भी करना होगा| आपको कुछ अच्छे कर्म करने होंगे|
प्रेम और भक्ति का भाव कर्म से मुक्त होने के लिये समान अनुपात में काम करता है|

प्रश्न :मेरे कायरतापूर्ण व्यवहार के कारण मैं जीवन में चुनौतियों से भागता हूँ| इससे कैसे निकला जाये?
श्री श्री रविशंकर : सब से पहले यह जान लीजिये कि कोई भी चुनौतियां आप के सामने हो, आप के पास उससे सामना करने की शक्ति है| यह आपको समझना होगा| आप के पास उससे सामना करने की शक्ति और उर्जा है| आप इस विश्वास के साथ आगे बढ़े, मैं आपके साथ हूँ|

प्रश्न : गुरुदेव मृत आत्मा के लिये लिये हम कई रस्में और अनुष्ठान करते हैं| क्या इसके कोई मायने होते हैं?
श्री श्री रविशंकर : यह रस्में और अनुष्ठान मृत आत्मा के लिये कृतज्ञता  दिखाने के जैसा है| लेकिन पंडितों और पुरोहितों ने इसे इतना जटिल बना दिया है, कभी कभी आपको यह समझ में ही नहीं आता कि वे क्या कह रहे हैं|
यदि संस्कृत में वे जो कुछ भी कह रहे हैं उसका अनुवाद करे तो फिर कुछ समझ में आएगा|
क्या आपको पता है कि आप तिल के बीज लेकर कहते हैं तर्पयमी, तर्पयमी, तरायमी? इसे तर्पणम कहते हैं| आप मृत आत्मा का नाम लेकर हाथ में पानी और तिल के बीज को एक पत्तल में छोड़ देते हैं| आप ऐसा क्यों करते हैं? आप मृत आत्मा से कहते हैं कि आपके मन में जो भी इच्छायें रह गयी है, वे तिल के बीज के जैसे हैं बिलकुल महत्वहीन| वे बिलकुल छोटी बातें हैं इसलिये उन्हें छोड़ दे| दिव्यता के घर में असीमित अनंत और परमानंद हैं, इसलिये सिर्फ उसी का आनंद ले| हम आपकी अधूरी इच्छाओं का ध्यान रखेंगे| आप सिर्फ तृप्त और खुश रहे|
तर्पणम में हम मृत आत्मा से यह कहते हैं| उनकी भी इच्छायें होती है;  वे अपने नातियों की शादी देखना चाहते हैं या अपने पोतों की या नाती पोतों के घर एक और बेटी का जन्म| मृत्यु के पहले इस किस्म की इच्छा उनके मन में रह जाती है, इसलिये हम उनसे कहते हैं, यह सारी इच्छायें बहुत छोटी है, इसलिये
उन्हें छोड़ दे| प्रेम जीवन का सार है और दिव्यता तो पूर्णतः प्रेम है| आप उस प्रकाश की ओर जाये जो पूर्णतः प्रेम है|
मृत आत्मा को निर्देश देने को ही श्राद्ध कहते हैं|
फिर आप आशीर्वाद मांगते हैं, मैं अपना काम यहाँ पर करूँगा, आप वहाँ से यह कर सकते हैं कि मुझे आशीर्वाद दीजिये जिससे मेरा मन सही पथ रहे ओर मैं सही बातें सही समय पर करूं| अच्छे भाग्य ओर समृद्धि के लिये मुझे आशीर्वाद दीजिये|
इस प्रकार का श्राद्ध दुनिया भर में किया जाता है| यहाँ तक दक्षिण अमरीका में भी| किसी विशेष दिन पर सारा शहर
सड़कों पर अपने पूर्वजों के लिये आ जाता है और पुतले जलाता है और सड़कों पर अन्य कई चीज़ें करता है| वे इसे चीन और सिंगापुर में भी करते हैं|
क्या आपको पता है सिंगापुर में लोग क्या करते हैं? पूर्वजों के लिये एक विशेष दिन होता है| पूर्वजों को जो कुछ भी पसंद था लोग उसे कागज पर बनाते हैं और उसे जलाते हैं| यदि उनके पिता को कार पसंद थी तो फिर वे बढ़िया बेंज कार बनायेंगे और उसे सिंगापुर के
सड़कों पर रख कर जला देते हैं|
चीन में यह मान्यता है कि यदि नकली नोटों को जलाया जाये तो वह पूर्वजों तक पहुँच जाती है और वे उनको अच्छा भाग्य देती हैं| मुझे तो लगता है कि यह धोखाधड़ी है| फिर भी यह उनका विश्वास है| इसलिये वे सडकों के बीचों बीच घर बनाकर उसे जला देते हैं| वे सोचते हैं कि दूसरी तरफ से आशीर्वाद आएगा|
इस तरह दूसरी तरफ के लोगों से जुड़ने को ही श्राद्ध कहते हैं|  यह विश्वास है और विश्वास के साथ दूसरी दुनिया के लोगों का सम्मान करना श्राद्ध है|
यूरोप में भी एक सर्व संत दिवस होता है और लोग उनकी कब्र पर जाकर फूल चढ़ाते हैं| विश्वास तो सभी धर्मों और संस्कृतियों में होता है| यहाँ पर संस्कृत में उसका कुछ अर्थ है लेकिन लोग समझ नहीं पाते|
जैसे पिंड दान, हमारा सारा शरीर अन्न के बर्तन से बना हुआ है, ठीक है न? इसलिये यह रस्म है कि एक बर्तन में अन्न रखा जाता है जो भी उस मृत आत्मा को पसंद था| इसलिये मृत आत्मा की याद में आप वहीं भोजन पकाते हैं जो मृत आत्मा को पसंद था और उसे गरीब लोगों को खिला देते हैं|
यह श्रद्धा है और इसे कृतज्ञता के भाव के साथ करना चाहिये और पूर्वजों को याद करते समय यह एक उत्सव के जैसे होना चाहिये|
उनकी याद में आप इतना तो कर ही सकते हैं कि उनके पसंद के भोजन को पकाये और उसे खुद खाए और कुछ अन्य लोगों को भी खिलाये और उसका आनंद ले|
उन्हें धन्यवाद दे वे जिस भी दुनिया में हो और उनके प्रगति के लिये कामना करे और उनसे आशीर्वाद मांगे जिससे आपकी यहाँ की यात्रा में प्रगति हो|

प्रश्न : लोग अपनी जिंदगी को समाप्त करने के बारे में क्यों सोचते हैं?
श्री श्री रविशंकर : वे ऐसा बुद्धि की कमी के कारण करते हैं| वे यह इसलिये करते हैं क्योंकि वे सुख के प्रति काफी आकर्षित होते हैं| इसलिये जब भी उन्हें कोई दुःख मिलता है तो दुःख से छुटकारा पाने के लिये वे अपने आप को मार देते हैं| यह एक अत्यंत मूर्खपूर्ण कृत्य है| यह ऐसा है कि जब आप ठंड  से काँप रहे हैं और उस समय आपने शर्ट और जैकेट को उतार दिया हो| ऐसा करने से ठंड कम नहीं होने वाली| क्योंकि उनमे यह समझ नहीं है इसलिये वे ऐसा करते हैं|
इसलिये हमें शुरुआत से ही आध्यात्मिक शिक्षा की आवश्यकता है|
जिन लोगों में दुःख और आलोचना सहने की तपस्या होती है, वे लोग इन समस्याओं का सामना कर सकते हैं, उन्हें आत्मबल मिलता है, माने आत्मा का बल और वे कभी आत्म हत्या नहीं करते|
जब आत्मा कमजोर होती है और उसमे बल नहीं होता और जब कोई सुख के प्रति खूब आकर्षित हो तो वही आत्म हत्या करता है|
इसलिये सुख का बंधन शुरुआत से ही खत्म कर देना चाहिये| जब लोगों को कठिन परिस्थिति का सामना करना आता हो और वे आलोचना सह सकते हैं फिर वे कभी अपने जीवन में आत्म हत्या नहीं करते|

प्रश्न : गुरूजी मोक्ष के बारे में कुछ बताए?
श्री श्री रविशंकर : आपकी जो भी इच्छायें हो वह मृत्यु के पहले ही समाप्त हो जाये| एक ऐसा क्षण होना चाहिये जब आपको लगे, कि मुझे कुछ नहीं चाहिये, यह मोक्ष है| मोक्ष के लिये मरने की आवश्यकता नहीं है| मृत्यु के पहले आपको तृप्त होना चाहिये| जब जीवन में तृप्ति आ जाये तो सिर्फ मुक्ति और अधिक मुक्ति ही प्राप्त होती है|

प्रश्न : गुरु पूर्णिमा के दिन आपको रोते हुये देख कर मुझे बहुत बुरा लगा|
श्री श्री रविशंकर : नहीं, आंसू सिर्फ इसलिये नहीं आते क्योंकि कोई परेशान है; आंसू प्रेम की वजह से भी आते हैं| मैं वहाँ सभी लोगों को दर्शा रहा था| सभी लोग वहाँ रो रहे थे, इसलिये इस शरीर से भी आंसू आ गये| गुरु पूर्णिमा के दिन सभी लोग कृतज्ञता और आभार से परिपूर्ण थे| वहाँ एक भी आँख सूखी नहीं थी| इसलिये जब सब की आँखे भर आई तो मेरी भी आँख भर आई|